वैदिक और आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणालियों में तुलना
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वैदिक और आधुनिक भारतीय शिक्षा प्रणालियों में तुलना

भारत में शिक्षा का महत्व हमेशा से बहुत अधिक रहा है। गुरुकुलों से बौद्ध विश्वविद्यालयों तक – भारत के ‘विश्वगुरु’ बनने में हर शिक्षा केंद्र का सामान योगदान रहा।

पहले मौखिक या लिखित माध्यमों से व्यावहारिक ज्ञान छात्र-छात्राओं को दिया जाता था। इसके लिए बच्चों को थोड़ा बड़ा होते ही गुरुकुल भेज दिया जाता था, जहाँ वह ब्रह्मचर्य (0-25 वर्ष) व्यतीत करते थे। आज की शिक्षा प्रणाली से इसकी तुलना करें, तो हमें कई ग्राह्य बातें और कई नकारात्मक पहलू मिल सकते हैं। तो क्यों ना एक बार विचार करें कि वैदिक शिक्षा प्रणाली से क्या सीखा जा सकता है?

वैदिक और आधुनिक शैक्षिक प्रणाली एक दूसरे से बहुत अलग हैं। ब्रिटिश शासन के दौरान आधुनिक शिक्षा प्रणाली शुरू की गई थी, जो ब्रिटेन की व्यवस्था से काफी हद तक प्रेरित है।

भारतीय शिक्षा प्रणाली में धर्म, वेद, शास्त्र, दर्शन, व्यावहारिक ज्ञान, राजनीति आदि पढ़ाया जाता था, वहीं आज हम विभिन्न विषयों में एक निर्धारित पाठ्यक्रम के अनुसार शिक्षा ग्रहण करते हैं। पाठ्यक्रम और पाठ्य सामग्री दोनों ही प्रणालियों के लिए कालानुसार है, जो कि ठीक भी है। बदला है तो पढ़ने-पढ़ाने का तरीका!

विश्लेषण के बाद, मेरे अनुसार, कई बातें ऐसी हैं जो हम वैदिक शिक्षा प्रणाली से आधुनिक में अपना सकते हैं –

  • सामाजिकता और व्यवहारिकता

प्राचीन भारतीय शैक्षणिक प्रणाली में समाज की एक अहम् भूमिका थी। बहुत से बच्चों के साथ रहना, ईंधन-लकड़ी इकट्ठा करना, पानी की आपूर्ति करना और शिक्षक की सभी बातें मानना इत्यादि विद्यार्थियों की दिनचर्या का हिस्सा हुआ करता था। श्रम और समाज के प्रति दायित्व के साथ-साथ व्यवहारिक ज्ञान देने का एक अच्छा तरीका था। आधुनिक शिक्षा प्रणाली के अनुसार शिक्षक का कर्तव्य बच्चों को किताबी ज्ञान देने तक सीमित कर दिया गया है, पर क्या आपको लगता है कि सिर्फ और सिर्फ किताबें पढ़ना और रटा हुआ ज्ञान लिखते रहना किसी के व्यक्ति का समुचित विकास कर सकता है?

  • शिष्टाचार

घटती सहनशीलता, बढ़ती बुरी आदतें, छोटे से बड़ों कर का अपमान करना [सामने या पीठ पीछे], अपशब्दों का बढ़ता इस्तेमाल, मदद ना करने की प्रवृत्ति और भी ना जाने क्या-क्या! क्या आपको नहीं लगता कि आजकल बच्चों में यह सब आदतें बहुत तेजी से बढ़ रही हैं, और साथ ही बढ़ रहे हैं बच्चों के द्वारा और उन पर होने वाले अपराध। इसलिए शायद आज भी कई शिक्षा केंद्रों में नैतिक शिक्षा को बहुत जरूरी माना जाता है, जो कि गुरुकुलों का अभिन्न अंग थी। आज हमें इसकी बहुत जरूरत है।

  • ●     व्यावसायिक ज्ञान

वैदिक शिक्षा में छात्रों को पशुपालन व कृषि जैसे अनेकों व्यवसायों का प्रशिक्षण दिया जाता था। प्राचीन भारतीय शिक्षा केवल सैद्धांतिक नहीं थी बल्कि जीवन की वास्तविकताओं से संबंधित थी। आप कल्पना करिये कि आज हम डिग्री ले कर निकल रहे छात्र-छात्राओं को इंडस्ट्रियल ट्रेनिंग दे कर उनका कितना समय नष्ट करते हैं! क्या यहीं सब उन्हें पाठ्यक्रम के दौरान नहीं सिखाया जा सकता?

  • ●     आत्मरक्षण और राजनीति

नहीं, यहाँ उन पढ़ाई-लिखाई छोड़कर बिना बात के धरने देते छात्र नेताओं की बात नहीं हो रही है। हम बात कर रहे हैं उन कक्षाओं की जहाँ राजनीति और समाज के गंभीर मुद्दों पर चर्चा होती थी, जिससे बच्चे अपने राज्य की स्तिथि समझ पाएँ।

आत्म-रक्षण और राज्य की सुरक्षा में यह युवा निपुण हो सकें, उसके लिए गुरुकुलों में युद्ध-विद्याओं की पूरी शिक्षा दी जाती थी। इसमें विद्यार्थी तलवार से लेकर धनुष और मल्लयुद्ध तक सब कुछ सीखते थे। आजकल कई विद्यालयों में जूडो, कराटे आदि सिखाया जाने लगा है, पर यह अनिवार्य नहीं है।

  • ●     विचार प्रणाली विकसित करने पर अधिक योगदान

आधुनिक शिक्षा में हर किसी विद्यार्थी को समान समझा जाता है और परीक्षा में उनसे उम्मीद कि जाती है कि वह कक्षा में पढ़ाया गया उत्तर ही दें। गुरुकुलों में परीक्षाएँ लिखित नहीं होती थीं, बल्कि बच्चों के मस्तिष्क की क्षमताएँ और क्रियात्मकता का पता लगाने के लिए होती थीं। इससे बच्चों की विचार करने की क्षमता बढ़ती थी।

जरूरी नहीं था के हर बच्चा पूरे 25 वर्ष गुरुकुल में ही गुजारे, हो सकता था कि वह शिक्षा जल्दी पूरी कर ले या देर में पूरी करे।

आधुनिक शिक्षा के साथ समस्या यह है कि शुरूआती 5 साल, जब मस्तिष्क का सबसे तेजी से विकास हो रहा हो है, हम बच्चों को प्री-नर्सरी, नर्सरी, यू. के. जी. , एल. के. जी. और भी पता नहीं कितनी क्लासें पढ़ने के लिए भेज देते हैं। उसके बाद के बारह साल  (कम से कम 8-10 साल तक) सारे बच्चे एक ही प्रकार का पाठ्यक्रम पढ़ते हैं। मतलब जीवन के 3+5+12 = 20  कीमती वर्ष निकल जाने के बाद आप बच्चों से पूछते हैं कि उनको करना क्या है, जो कि वह खुद से तय नहीं कर पाते क्योंकि इससे पहले उन्होंने इस बात पर इतना विचार ही नहीं किया! फिर शुरू होती है भेड़चाल।

लोगों की सोच के कुछ उदाहरण देख लीजिये –

दोस्त इंजिनीयरिंग कर रहा है और मेरा रचनात्मक स्तर बहुत अच्छा है, पर फिर भी मैं तो इंजिनीयरिंग ही करुँगी।

मुझे प्रोग्रामिंग समझ नहीं आती और पाककला में महारत हासिल है, फिर भी मेरा उद्देश्य तो डेवलपर बनना ही है क्योंकि इसमें बहुत स्कोप है।

किसी क्षेत्र में लोगों की अधिकता की वजह से बढ़ती बेरोजगारी और किसी में लोगों की अत्यधिक कमी का कारण यही है कि बच्चे रुचि के अनुसार नहीं स्कोप के अनुसार पढ़ाये जाने लगे हैं क्योंकि उनकी रुचि का अंदाजा ही लग पाता – 20-25 साल की पढ़ाई के बाद भी! क्या यह उचित है?

यही आपको भी यह गलत लगता है तो आधुनिक शिक्षण प्रणाली में अभी बहुत बदलाव की आवश्यकता है, इस बात से आप इंकार नहीं कर सकते हैं।

Ms Techie
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